ट्रेन कब आएगी पता नहीं चलता": दुर्ग के 23 कुलियों की पुकार सुन विधायक ने 30 मिनट में कर दिया कमाल!

दुर्ग रेलवे स्टेशन, शनिवार। स्टेशन की भीड़भाड़ में, पसीने से लथपथ कमीजें पहने, बोझ उठाते कुली। ये वो अनसुनी आवाजें हैं जो ट्रेनों के आने-जाने का तालमेल बनाए रखती हैं, मगर खुद डिजिटल दुनिया से कोसों दूर। एक ऐसे ही दिन, जब विधायक रिकेश सेन वैष्णो देवी यात्रियों को विदा करने पहुंचे, तो कुलियों ने अपना दर्द बयां किया – और जो हुआ, वो एक मिसाल बन गया।

 पीढ़ियों की सेवा, मगर बुनियादी सुविधाएं नदारद: कुलियों का दर्द


विधायक सेन से पहले रूबरू हुईं स्टेशन की इकलौती महिला कुली ने हिम्मत जुटाकर सच्चाई खोली: "सर, हम 23 कुली परिवार पीढ़ियों से यहां यात्रियों की सेवा कर रहे हैं। लेकिन हमारे पास नहीं हैं स्मार्टफोन, इसलिए नहीं देख पाते हैं कब आएगी ट्रेन! न हमें पीएफ-पेंशन मिलती है, न कोई सरकारी चिकित्सा सहायता।"


यह सुनते ही दूसरे कुली भी जुट गए। उनकी आवाज़ में मायूसी थी, मगर उम्मीद की एक किरण भी। एक कुली ने बताया, "ज्यादातर के पास तो बस पुराने की-पैड फोन या 3जी मोबाइल हैं। ट्रेन का सही समय पता नहीं चलता। कभी घंटों खाली बैठे रहना पड़ता है, तो कभी खाना खाते-खाते ट्रेन छूट जाती है। काम चौपट हो जाता है।" दशकों पुरानी ये समस्यांए अचानक सामने थीं – डिजिटल असमानता, सामाजिक सुरक्षा का अभाव, और जीवनयापन की अनिश्चितता।


 विधायक का फौरन एक्शन: "5 मिनट में आ जाएंगे फोन!"


विधायक रिकेश सेन ने कुलियों की बातें गंभीरता से सुनीं। उनके चेहरे पर सहानुभूति थी, लेकिन संकल्प भी। कागजी कार्रवाई या लालफीताशाही का इंतज़ार किए बिना, उन्होंने तुरंत अपना फोन निकाला। जवाहर नगर मार्केट व्यापारी संघ के अधिकारियों से उनकी बात हुई। उनका आग्रह स्पष्ट और तत्काल था: "दुर्ग स्टेशन के इन मेहनतकश कुलियों के लिए 23 अच्छे 5जी स्मार्टफोन चाहिए। जल्द से जल्द।"


 जनसहयोग का जादू: 30 मिनट में खिल उठे 23 चेहरे!


विधायक की पुकार और स्थानीय व्यापारियों के सहयोग ने कमाल कर दिया। महज 30 मिनट के भीतर, ब्रांड नए स्मार्टफोन्स का एक पार्सल दुर्ग स्टेशन पर पहुंच गया। यह न सिर्फ फोन का आगमन था, बल्कि कुलियों के जीवन में डिजिटल क्रांति का प्रवेश द्वार भी। विधायक सेन ने व्यक्तिगत रूप से हर एक कुली को नया स्मार्टफोन सौंपा।


पल भर को स्टेशन पर सन्नाटा छा गया, फिर तालियों की गड़गड़ाहट से हवा गूंज उठी। कुलियों के चेहरे पर आश्चर्य, अविश्वास और फिर खुशी की चमक साफ देखी जा सकती थी। एक बुजुर्ग कुली के आंखों में आंसू थे, "अब ट्रेन का टाइम मिस नहीं होगा साहब! बच्चों को भी वीडियो कॉल कर पाऊंगा!" यह सिर्फ एक गैजेट नहीं था; यह सम्मान, सशक्तिकरण और जीवन की गुणवत्ता में सुधार का प्रतीक था।


 सिर्फ फोन नहीं, सुरक्षा कवच का भी वादा


विधायक सेन ने स्मार्टफोन वितरण से आगे बढ़कर कुलियों के दीर्घकालिक कल्याण का भी ठोस आश्वासन दिया। उन्होंने कुलियों को "वास्तविक श्रम की प्रतिमूर्ति" बताते हुए कहा:


1. दुर्घटना बीमा: काम के दौरान होने वाली किसी भी दुर्घटना के लिए बीमा सुरक्षा दिलाने का वादा।

2. सस्ती चिकित्सा सुविणा: स्थानीय निजी अस्पतालों में उनके और उनके परिवारों के लिए 40% छूट पर इलाज की व्यवस्था कराने का आश्वासन।

3. केंद्र सरकार से अपील: पीएफ, पेंशन और अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं तक उनकी पहुंच सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार को पत्र लिखने का वचन।


 एक छोटी पहल, एक बड़ा संदेश


इस घटना ने दुर्ग स्टेशन पर एक अनूठा उत्साह का माहौल बना दिया। कुली, जो अक्सर अदृश्य रह जाते हैं, उस दिन नायक बन गए। विधायक सेन ने अंत में वैष्णो देवी और स्वर्ण मंदिर के श्रद्धालुओं को गमछा पहनाकर विदा किया, मगर उस दिन की सबसे बड़ी विदाई शायद कुलियों की बेबसी की थी।


  निष्कर्ष: रिकेश सेन की यह पहल सिर्फ 23 स्मार्टफोन बांटने की कहानी नहीं है। यह जनसेवा की सार्थकता, त्वरित निर्णय की शक्ति, और स्थानीय समुदाय के सहयोग की मिसाल है। यह उन गुमनाम मेहनतकशों की ओर ध्यान खींचता है जो हमारे रोज़मर्रा के जीवन को चलाए रखते हैं, और याद दिलाता है कि डिजिटल भारत की राह में हर एक हाथ में स्मार्टफोन और हर एक दिल में सम्मान होना कितना ज़रूरी है। यह घटना एक स्पष्ट संदेश देती है: सही इरादा और तत्परता हो, तो बड़े से बड़ा बदलाव पल भर में लाया जा सकता है। दुर्ग स्टेशन की वह तालियां सिर्फ एक विधायक के लिए नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना और कार्यकुशलता की जीत के लिए बजी थीं।

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