बिहार में SIR रद्द हो सकता है! सुप्रीम कोर्ट का बड़ा बयान

 बिहार में SIR रद्द हो सकता है! सुप्रीम कोर्ट का बड़ा बयान 

   विपक्ष और चुनाव आयोग के बीच तनाव जारी

बिहार में मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण (Special Summary Revision - SIR) को लेकर राजनीतिक उठापटक जारी है। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि इस प्रक्रिया में धांधली हो रही है और लाखों वैध मतदाताओं के नाम सूची से गायब किए जा रहे हैं। इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि "अगर बिहार की मतदाता सूची में अवैधता साबित होती है, तो सितंबर तक इसके परिणामों को रद्द किया जा सकता है।"  


यह टिप्पणी विपक्ष के लिए एक बड़ी राहत मानी जा रही है, जो लगातार SIR प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा है।  

   संसद से सड़क तक विरोध प्रदर्शन  

विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को संसद तक पहुंचाया है और मंगलवार को भी उन्होंने संसद के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। विपक्ष का आरोप है कि भाजपा और चुनाव आयोग मिलकर मतदाता सूची में हेराफेरी कर रहे हैं तथा वैध मतदाताओं को वोटिंग से वंचित किया जा रहा है। 

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कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और अन्य दलों के नेताओं ने चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि "यह लोकतंत्र पर हमला है और जनता के अधिकारों को कुचला जा रहा है।"  

   सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, क्या कहा गया?  

मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने की। कोर्ट ने चुनाव आयोग से सवाल किया कि "क्या SIR का उपयोग फर्जी मतदाताओं को हटाने के लिए किया जा रहा है या फिर वैध मतदाताओं को सूची से बाहर किया जा रहा है?"  

   योगेंद्र यादव ने उठाए सवाल  

याचिकाकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने कोर्ट में दलील दी कि "घर-घर जाकर सत्यापन करने के बावजूद अधिकारी किसी भी घर में नया नाम नहीं ढूंढ पा रहे हैं।" उन्होंने नोटबंदी का उदाहरण देते हुए कहा कि "नोटबंदी के दौरान तो RBI ने अधिसूचना जारी की थी, लेकिन बिहार में SIR बिना किसी पारदर्शिता के लागू किया जा रहा है।" 

   अभिषेक मनु सिंघवी की दलीलें  

वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कोर्ट में कहा कि "अगर किसी व्यक्ति का नाम पहले से मतदाता सूची में है, तो चुनाव आयोग यह नहीं मान सकता कि वह अवैध है।" उन्होंने आगे कहा कि "चुनाव आयोग ने मतदाताओं पर यह जिम्मेदारी डाल दी है कि वे अपनी नागरिकता साबित करें, जबकि यह प्रक्रिया बेहद जटिल और समयसीमा के भीतर असंभव है।"  

   चुनाव आयोग का रुख 

चुनाव आयोग ने अपनी ओर से कहा है कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को साफ करना और डुप्लीकेट या फर्जी नामों को हटाना है। हालांकि, विपक्ष का आरोप है कि आयोग ने इस प्रक्रिया को इतनी जल्दबाजी में लागू किया है कि वैध मतदाताओं के पास अपना नाम सूची में बचाने का समय ही नहीं मिल रहा। 

   आगे की कार्रवाई क्या होगी?  

  •  सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए चुनाव आयोग से जवाब मांगा है।  
  •  अगर कोर्ट को लगता है कि SIR प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है, तो सितंबर तक इसे रद्द किया जा सकता है।  
  •  विपक्ष ने संसद में इस मुद्दे पर बहस की मांग की है और आंदोलन जारी रखने की चेतावनी दी है।  

   निष्कर्ष  

बिहार में SIR को लेकर चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। विपक्ष का आरोप है कि यह प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है और इसके तहत वैध मतदाताओं को सूची से हटाया जा रहा है। अगर कोर्ट इन आरोपों को सही पाता है, तो SIR को रद्द किया जा सकता है, जिससे बिहार की राजनीति में नया मोड़ आ सकता है।  

इस मामले में अगले कुछ दिनों में और तेजी आने की उम्मीद है, क्योंकि चुनाव आयोग को अब कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखना होगा।

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