खुड़ावल: जबलपुर का वो गाँव जहाँ हर घर से निकलता है एक सैनिक(देशभक्ति की जीती-जागती मिसाल)
गाँव का परिचय: मिट्टी में रचा-बसा है देशप्रेम
मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले की मझौली तहसील में बसा खुड़ावल गाँव किसी ‘मिनी कैंटोनमेंट’ से कम नहीं। यहाँ की 3,000 की आबादी वाले इस गाँव के हर दूसरे घर से कोई न कोई युवा सेना, सीआरपीएफ या अन्य सशस्त्र बलों में देश की सेवा कर रहा है। 1975 से अब तक 50 से ज़्यादा युवाओं ने सेना की वर्दी पहनी है, जबकि 55 सेवानिवृत्त जवान आज भी गाँव को प्रेरित करते हैं।
वीरगाथा: तीन बलिदानों ने लिखी शौर्य की इबारत
गाँव के इतिहास में तीन नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज हैं, जिन्होंने देश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया:
1. राजेंद्र प्रसाद उपाध्याय (2005):
बालाघाट में माओवादियों के साथ मुठभेड़ में शहीद हुए। ये गाँव के पहले बलिदानी थे, जिनकी वीरगाथा ने युवाओं में जोश भर दिया।
2. रामेश्वर लाल पटेल (2016):
जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा में आतंकी हमले में अदम्य साहस दिखाते हुए शहीद।
3. अश्विनी कुमार काछी (2019):
पुलवामा हमले (14 फरवरी) में सीआरपीएफ की 35वीं बटालियन के साथ वीरगति को प्राप्त। उनकी याद में गाँव में ‘बलिदानी स्मारक’ बनाया गया, जहाँ परिवार रोज़ दीप जलाता है।
सेवानिवृत्त सैनिक: युवाओं के मार्गदर्शक
गाँव के मैदान में रोज़ सुबह-शाम एक अलग ही दृश्य होता है। यहाँ सेवानिवृत्त जवान युवाओं को फिज़िकल ट्रेनिंग, ड्रिल और देशभक्ति की प्रेरणा देते हैं। आसपास के गाँवों (दर्शनी, गुरुजी, भिटोनी) के युवा भी यहाँ प्रशिक्षण लेने आते हैं।
गजेंद्र खंपरिया (सरपंच) बताते हैं:
"1975 में मेरे चाचा शिव कुमार पहले सैनिक बने। तब से यह सिलसिला थमा नहीं। हर भर्ती में गाँव का कोई न कोई युवा चुना जाता है।"
बेटियाँ भी पीछे नहीं: पूजा पटैल बनीं मिसाल
देशभक्ति की इस अलख में बेटियों ने भी बाज़ी मारी है। पूजा पटैल ने हाल ही में सीआरपीएफ में चयन पाकर गाँव का नाम रोशन किया। ग्रामीणों का कहना है – "अब लड़कियाँ भी बॉर्डर पर दुश्मनों से लोहा लेंगी!"
चुनौतियाँ: संसाधनों की कमी, पर जज्बा बुलंद
गाँव के प्रशिक्षण मैदान की हालत दुरुस्त नहीं है। ग्रामीण इसे विकसित करने की माँग करते हैं, ताकि युवाओं को बेहतर सुविधाएँ मिल सकें। फिर भी, हौसले को कोई धक्का नहीं लगता। 2019 के पुलवामा हमले के बाद तो गाँव के हर युवा की आँखों में दुश्मनों को मुँहतोड़ जवाब देने का संकल्प दिखता है।
क्यों है खास यह गाँव?
- सामुदायिक एकता: शहीदों के परिवारों का सम्मान और उनकी याद में सामूहिक कार्यक्रम।
- देशभक्ति की शिक्षा: बचपन से ही बच्चों को सेना के किस्से सुनाए जाते हैं।
- गर्व का पल: हर बार जब गाँव का कोई युवा वर्दी पहनकर घर लौटता है, पूरा गाँव उसका स्वागत करता है।
निष्कर्ष: जहाँ हर सांस में बसता है ‘भारत माता की जय’
खुड़ावल सिर्फ़ एक गाँव नहीं, बल्कि देशभक्ति का जीवंत संस्करण है। यहाँ का हर बच्चा बड़े होकर फौजी बनने का सपना देखता है, और हर माँ अपने बेटे-बेटियों को तिरंगे के लिए समर्पित करने को तैयार रहती है। जब तक ऐसे गाँव भारत में हैं, तब तक दुश्मनों के मंसूबे धरे के धरे रह जाएँगे!

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