मध्य प्रदेश में सरकारी अस्पतालों की दवाओं पर उठे सवाल: पैरासिटामोल ड्रॉप से लेकर मल्टीविटामिन तक, 6 दवाएं अमानक पाई गईं

मध्य प्रदेश में सरकारी अस्पतालों की दवाओं पर उठे सवाल: पैरासिटामोल ड्रॉप से लेकर मल्टीविटामिन तक, 6 दवाएं अमानक पाई गईं 

ऐसा पहली बार नही हो रहा जब दवाओं पर सवाल उठे हो ऐसा कई बार हो चूका है जब दवाए मानक में सही न उतरी हो और उनपर रोक लगे गयी हो!

मध्य प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में मरीजों को दी जाने वाली दवाओं की गुणवत्ता को लेकर चिंता बढ़ गई है। इस साल अब तक छह दवाएं गुणवत्ता परीक्षण में फेल हुई हैं, जिनमें बच्चों के लिए इस्तेमाल होने वाला पैरासिटामोल ड्रॉप, मिर्गी की टैबलेट, विटामिन-सी और मल्टीविटामिन शामिल हैं। राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने इन दवाओं के उपयोग पर तत्काल रोक लगा दी है और आपूर्ति करने वाली कंपनियों पर प्रतिबंध भी लगाया है। 

   कौन सी दवाएं मिलीं अमानक?  

इस साल जनवरी से मई तक विभिन्न स्वास्थ्य केंद्रों से लिए गए सैंपल  की जांच में छह दवाएं खराब गुणवत्ता वाली पाई गईं। इनमें मई में तीन नए मामले सामने आए हैं: 
  •  लैवेसेटम 500 एमजी टैबलेट: मिर्गी के उपचार में प्रयुक्त यह दवा न केवल सरकारी अस्पतालों बल्कि आम लोगों के लिए भी चिंता का विषय है। 
  •  विटामिन-सी टैबलेट: प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली यह दवा भी गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतरी। 
  •  मल्टीविटामिन टैबलेट: पोषण संबंधी कमियों को पूरा करने के लिए दी जाने वाली यह दवा भी असुरक्षित पाई गई। 

इससे पहले, आईवी फ्लूइड और पैरासिटामोल ड्रॉप सहित अन्य दवाएं भी अमानक घोषित की जा चुकी हैं। इसके बाद भी ऐसी दवाओं पर रोक नही लग रहा!

   दवाओं की गुणवत्ता पर क्यों उठ रहे सवाल?  

आखिर सवाल क्यों उठ रहे दवाए अमानक पाए जाने के पीछे कई कारण सामने आए हैं।जो की स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, परिवहन और भंडारण की खामियां प्रमुख वजह हैं। कई सरकारी स्टोर में तापमान नियंत्रण की सुविधा नहीं है, जिससे दवाएं खराब हो जाती हैं। इसके अलावा, निर्माता कंपनियों की लापरवाही भी एक बड़ा मुद्दा है। 

और यही नही और भी सबसे दिलचस्प बात यह है कि कंपनियां दवाओं की आपूर्ति से पहले अपनी प्रयोगशालाओं और तीसरे पक्ष (थर्ड पार्टी) की लैब से जांच रिपोर्ट जमा करती हैं। इन रिपोर्ट्स के आधार पर ही दवाओं को अस्पतालों में इस्तेमाल की अनुमति मिलती है।बिना अनुमति के तो कोई भी दवाए नही आती  लेकिन जब राज्य सरकार की प्रयोगशालाओं में इन्हीं दवाओं के सैंपल की जांच होती है, तो वे अमानक निकलती हैं। यह अंतर एक गंभीर विसंगति की ओर इशारा करता है। 

   जांच प्रक्रिया में कहां हो रही है चूक?  

मध्य प्रदेश पब्लिक हेल्थ सप्लाई कॉर्पोरेशन के निर्देशानुसार, सभी जिलों के मेडिकल स्टोर से औचक सैंपल  एकत्र किए जाते हैं। इन्हें भोपाल स्थित राज्य औषधि प्रयोगशाला या केंद्रीय औषधि परीक्षण प्रयोगशालाओं में भेजा जाता है। हैरानी की बात यह है कि निजी लैब में मानक पाई गई दवाएं सरकारी लैब में फेल हो जाती हैं।आखिर ये कैसे हो जाता है और क्यों ये जांच का विषय है !

इस संदर्भ में स्वास्थ्य अधिकारी मानते हैं कि जांच के तरीकों में अंतर या प्रयोगशालाओं के मानकों में विसंगति भी एक कारण हो सकती है। हालांकि, इस मुद्दे पर गहन जांच की आवश्यकता है। ताकि ये पता लगाया जा सके की ऐसी लापरवाही क्यों हो रही !

   स्वास्थ्य व्यवस्था पर क्या होगा प्रभाव?

ये सिर्सफ दवाओं का सवाल नही है सरकारी अस्पतालों में मुफ्त दवाएं वितरित करने की योजना का उद्देश्य गरीबों को स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाना है। लेकिन अमानक दवाओं का मिलना इस योजना की विश्वसनीयता को खतरे में डालता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इस समस्या पर काबू नहीं पाया गया, तो यह जनता के स्वास्थ्य के साथ-साथ सरकारी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करेगा। 

   क्या है भविष्य की कार्ययोजना?

फिलहाल राज्य सरकार ने संबंधित कंपनियों पर दो साल तक प्रतिबंध लगा दिया है। साथ ही, सभी जिलों को निर्देश दिए गए हैं कि अमानक दवाओं का तत्काल उपयोग बंद किया जाए। भविष्य में दवाओं के भंडारण और परिवहन को लेकर सख्त दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे। इसके अलावा, निजी और सरकारी प्रयोगशालाओं के बीच समन्वय बढ़ाने पर भी विचार किया जा रहा है। 

   आम जनता क्या सतर्कता बरतें?  

स्वास्थ्य विभाग ने नागरिकों से अपील की है कि यदि उन्हें सरकारी अस्पतालों से मिली दवाओं का रंग, गंध या प्रभाव असामान्य लगे, तो तुरंत मेडिकल अधिकारी को सूचित करें। साथ ही, दवाओं की एक्सपायरी डेट और मैन्युफैक्चरिंग डिटेल्स जांचना भी जरूरी है। 

इस पूरे मामले ने स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग को फिर से उजागर किया है। अब देखना यह है कि क्या सरकारी तंत्र इस चुनौती को गंभीरता से लेते हुए ठोस कदम उठाता है।

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