पिता के शक ने ली चार मासूम जानें: चिप्स खिलाने के बाद बच्चों को जकड़ लिया ट्रेन के सामने

फरीदाबाद की वह दोपहर जब पार्क जाने की खुशी बनी मौत का सफर 

   मासूमों को बहलाया, फिर मौत के घाट उतारा  

मंगलवार दोपहर, बल्लभगढ़ रेलवे स्टेशन से महज डेढ़ किलोमीटर दूर। 35 वर्षीय मनोज अपने चार बेटों – पवन, कारू, मुरली और छोटू को लेकर पहुँचा। बच्चों को लगा वे पापा के साथ मस्ती करने जा रहे हैं। मनोज ने उन्हें बहलाने के लिए कोल्ड ड्रिंक्स, चिप्स और पकौड़े दिए। बच्चे खुशी-खुशी बैठकर खा रहे थे। लेकिन यह खाना उनकी जिंदगी का आखिरी नाश्ता था। जैसे ही दूर से ट्रेन आती दिखी, मनोज ने अचानक चारों बच्चों को जकड़ लिया।  

   रोते-बिलखते मासूम, पर पिता का दिल न पसीजा  

"ट्रेन आ रही है पापा! छोड़ दो हमें!"  

बच्चे डर से चीखने-रोने लगे। ट्रेन जैसे-जैसे नजदीक आती गई, उनका रोना बिलखने में बदल गया। उनकी आँखों में मौत साफ दिख रही थी। लेकिन पिता के रूप में खड़ा शैतान उन पर पसीजने को तैयार नहीं था। मनोज ने पूरी ताकत से बच्चों को थामे रखा। ट्रेन की भीषण टक्कर ने चारों मासूमों की जान ले ली। पास खड़ा पिता, जिसे बच्चों ने अपना सबसे सुरक्षित ठिकाना समझा था, उनकी मौत का सबब बन गया।  

   शक की आग में जलकर हुआ था अंधा  

पत्नी प्रिया के अनुसार, मनोज का दिमाग शक की आग में पूरी तरह जल चुका था:  

  •  हर बात पर संदेह: "वह मुझ पर हमेशा शक करते थे। अगर मैं फोन पर किसी से बात करती, तो उन्हें लगता कि वह मेरा कोई आशिक है।"  
  •  तर्क का अभाव: "मैंने कई बार समझाया कि मैं अपने भाई से बात कर रही हूँ। लेकिन वे मानने को तैयार नहीं होते थे।"  
  •  लगातार झगड़े: "इसी बात को लेकर हमारे बीच अक्सर झगड़े होते रहते थे। घर का माहौल हमेशा तनावपूर्ण रहता।"  

यही पैथोलॉजिकल जलन और अविश्वास की भावना उस दिन इतनी भयानक हुई कि एक पिता ने अपनी ही संतानों को मौत के घाट उतार दिया।  

   पार्क घुमाने का बहाना था मौत का फंदा  

प्रिया ने दर्द भरे शब्दों में बताया कि कैसे उसके पति ने सब कुछ पहले से प्लान किया था:  

  •  मासूमों की जिद: "दोपहर में धूप बहुत थी। मैंने मनोज से कहा कि बच्चों को शाम को ले जाएँ। लेकिन बच्चे पार्क जाने की जिद करने लगे।"  
  •  छल का खेल: "मनोज ने पार्क घुमाने का बहाना बनाया। बच्चे बेहद खुश थे। कौन जानता था कि वह उन्हें जिंदगी भर के लिए दूर ले जाएगा?"  
  •  एक हफ्ता पहले ही लौटे थे: परिवार महज एक सप्ताह पहले ही बिहार से वापस फरीदाबाद आया था। नई शुरुआत की उम्मीदें, मौत के गर्त में समा गईं।  

   सवाल जो समाज और प्रशासन से पूछते हैं  

  •  कहाँ हैं मानसिक स्वास्थ्य सहायता तंत्र? मनोज के व्यवहार (लगातार शक, झगड़े) किसी गंभीर मानसिक असंतुलन या पैरानॉयड विचारों के संकेत थे। क्या परिवार या समाज के पास ऐसे संकेतों को पहचानने और सहायता लेने का कोई रास्ता था?  
  •  घरेलू हिंसा की रोकथाम कितनी प्रभावी? प्रिया के बयान से पता चलता है कि घर में तनाव और झगड़े आम थे। क्या ऐसे परिवारों की पहचान और उन्हें परामर्श देने की कोई प्रभावी प्रणाली है?  
  •  कब तक बचेंगे बच्चे? यह घटना उन अनगिनत मामलों में शामिल हो गई है जहाँ बच्चे माता-पिता के झगड़ों, मानसिक बीमारियों या क्रूर फैसलों की सबसे बड़ी कीमत चुकाते हैं।  

   अगले कदम: इंतजार परिवार का  

  •  पोस्टमॉर्टम रुका हुआ: जीआरपी डीएसपी राजेश चेची के अनुसार, मृतक बच्चों के परिवार (मूल रूप से बिहार के रहने वाले) को सूचना दी गई है। उनके फरीदाबाद पहुँचने के बाद ही पोस्टमॉर्टम होगा।  
  •  शक की पुष्टि करेंगे रिश्तेदार: पुलिस प्रिया के बयान (पति के शक और झगड़े) की पुष्टि के लिए परिवार के अन्य सदस्यों से बात करेगी।  
  •  मामला दर्ज: मनोज की आत्महत्या हो चुकी है। पुलिस ने बच्चों की हत्या का मामला दर्ज किया है और घटना की पूरी तहकीकात चल रही है।  

यह कहानी सिर्फ एक समाचार नहीं, एक सामाजिक चेतावनी है। यह पूछती है कि क्या हम उन संकेतों को पहचानने में नाकाम रहे जो एक पिता को अपने ही बच्चों के हत्यारे में बदलने जा रहे थे? यह उस सिस्टम पर सवाल खड़ा करती है जहाँ मानसिक संकट और घरेलू अशांति अक्सर नजरअंदाज हो जाती है, जब तक कि वह फरीदाबाद की उन रेलवे पटरियों की तरह भयानक तबाही न मचा दे। चार मासूमों की चीखें अब सिर्फ गूँज हैं, लेकिन उनकी मौत हमारे सामने एक जीवित सवाल छोड़ गई है: अगली बार किसकी बारी है?


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